नमस्ते! बच्चों और कमजोर व्यक्तियों की सुरक्षा कानून की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। कई बार कोई व्यक्ति बच्चे को बहला-फुसलाकर या जबरन ले जाता है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा धारा 137(2) BNS ठीक ऐसे अपहरण (Kidnapping) के अपराध को संबोधित करती है।
पुरानी IPC धारा 363 की जगह अब BNS 137(2) लागू होती है। इस लेख में हम 137 2 bns in hindi को बहुत आसान भाषा में विस्तार से समझाएंगे।

भारतीय न्याय संहिता 2023 की किताब
धारा 137 BNS क्या कहती है? (सरल व्याख्या)
धारा 137(1) BNS – अपहरण की परिभाषा: अपहरण दो प्रकार का होता है:
- भारत से अपहरण — किसी व्यक्ति को उसकी या उसके कानूनी अभिभावक की सहमति के बिना भारत की सीमा से बाहर ले जाना।
- वैध अभिरक्षा से अपहरण — 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को उसके वैध अभिभावक की देखरेख से बिना सहमति के ले जाना या बहकाना।
धारा 137(2) BNS – सजा: जो कोई भी व्यक्ति किसी को भारत से या वैध अभिरक्षा से अपहरण करता है, उसे 7 वर्ष तक की कैद (imprisonment of either description) और जुर्माना हो सकता है।
सरल शब्दों में:
- बच्चे को माता-पिता की अनुमति के बिना ले जाना अपहरण है (चाहे बच्चा खुद जाना चाहे)।
- सजा: अधिकतम 7 साल जेल + जुर्माना।
यह अपराध cognizable (बिना वारंट गिरफ्तारी) और bailable है।

बच्चों का अपहरण – जागरूकता इमेज
IPC 363 vs BNS 137(2): तुलना तालिका
| विवरण | पुरानी IPC धारा 363 | नई BNS धारा 137(2) | मुख्य बदलाव |
|---|---|---|---|
| अपराध का नाम | Kidnapping | अपहरण (Kidnapping) | भाषा ज्यादा स्पष्ट |
| सजा | 7 वर्ष तक कैद + जुर्माना | 7 वर्ष तक कैद + जुर्माना | कोई बड़ा बदलाव नहीं |
| प्रकृति | Cognizable, Bailable | Cognizable, Bailable | समान |
| परिभाषा | अलग धाराओं में | 137(1) में स्पष्ट परिभाषा | BNS में ज्यादा व्यवस्थित |
धारा 137(2) BNS के मुख्य तत्व
- 18 वर्ष से कम उम्र का बच्चा या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति
- वैध अभिभावक की सहमति के बिना ले जाना या बहकाना
- इरादा साबित करने की जरूरत नहीं — केवल कृत्य ही अपराध है
महत्वपूर्ण: नाबालिग की सहमति कोई बचाव नहीं है। अभिभावक की सहमति जरूरी है।
न्याय का प्रतीक – तराजू और हथकड़ी
वास्तविक उदाहरण
- पड़ोसी बच्चे को खेलने के बहाने ले जाता है और वापस नहीं करता।
- कोई व्यक्ति प्रेम प्रसंग में नाबालिग लड़की को घर से बहकाकर ले जाता है।
- बच्चे को स्कूल के रास्ते से उठाकर कहीं और ले जाना।
- मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को उसके परिवार से अलग करना।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नाबालिग के मामले में अभिभावक की सहमति सबसे महत्वपूर्ण है। कई फैसलों में कहा गया कि बच्चे की “सहमति” कानूनी रूप से मान्य नहीं होती।
पीड़ित (अभिभावक) के लिए स्टेप-बाय-स्टेप सलाह
- तुरंत पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराएं (BNS 137 लिखवाएं)।
- बच्चे की तस्वीर, डिटेल्स और आखिरी लोकेशन दें।
- गवाह और सबूत इकट्ठा करें।
- मीडिया और चाइल्डलाइन (1098) की मदद लें।
आरोपी के लिए सलाह
- तुरंत वकील से संपर्क करें।
- जमानत के लिए अर्जी दें (bailable होने के कारण आसानी से मिल सकती है)।
- अच्छी नीयत या गलतफहमी का बचाव रखें।
8 उपयोगी FAQs
1. धारा 137(2) BNS की सजा क्या है?
7 वर्ष तक की कैद और जुर्माना।
2. BNS 137(2) और IPC 363 में क्या अंतर है?
सजा समान है। BNS में परिभाषा ज्यादा स्पष्ट और आधुनिक है।
3. क्या यह अपराध जमानती है?
हाँ, bailable अपराध है।
4. नाबालिग की सहमति बचाव बन सकती है?
नहीं, अभिभावक की सहमति जरूरी है।
5. FIR कैसे दर्ज कराएं?
निकटतम पुलिस स्टेशन में शिकायत दें और BNS 137 लिखवाएं।
6. धारा 137(2) BNS कब लागू होती है?
जब बच्चे या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को वैध अभिरक्षा से बिना अनुमति के लिया जाए।
7. पीड़ित को क्या सबूत रखने चाहिए?
बच्चे की तस्वीर, गवाह, CCTV, कॉल रिकॉर्ड आदि।
8. क्या समझौता संभव है?
bailable होने के कारण समझौता संभव है, लेकिन अदालत की अनुमति जरूरी।
Disclaimer: This article is provided for informational and educational purposes only. It is not intended to be a substitute for professional legal advice. The information given here is based on the Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) 2023 and may not cover all nuances of individual cases. Laws can be subject to interpretation and change. Readers are strongly advised to consult a qualified lawyer or legal expert for any specific legal issue or case. The author and publisher shall not be liable for any loss or damage arising from the use of this information.
Last updated: April 24, 2026
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